9 August: विश्व आदिवासी दिवस विशेष: दुनिया को बचाने का प्रयास || World tribal day 2022

विश्व आदिवासी दिवस आदिवासियों के मूलभूत अधिकारों की सामाजिक, आर्थिक और न्यायिक सुरक्षा के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है। पहली बार आदिवासी दिवस 9 अगस्त 1995 को जेनेवा में मनाया गया।

आदिवासी समाज के लोग अपने धार्मिक स्थलों, घरों, खेतों आदि जगहों पर एक विशिष्ट प्रकार का झण्डा लगाते है, जो अन्य धमों के झण्डों से अलग होता है। आदिवासी झण्डें में सूरज, चांद, तारे इत्यादी सभी प्राकृतिक प्रतीक विद्यमान होते हैं और ये झण्डे सभी रंग के हो सकते है। वो किसी रंग विशेष से बंधे हुये नहीं होते।

आदिवासी शब्द दो शब्दों 'आदि' और 'वासी' से मिल कर बना है जिसका अर्थ ‘मूल निवासी’ होता है। विश्व के लगभग 90 से अधिक देशों मे आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं। जिनकी जनसंख्या लगभग 37 करोड़ है, जिसमें लगभग 5000 अलग–अलग आदिवासी समुदाय है और इनकी लगभग 7 हजार भाषाएं हैं। भारत में लगभग 700 आदिवासी समूह व उप-समूह हैं। इनमें लगभग 80 प्राचीन आदिवासी जातियां हैं। भारत की जनसंख्या का 8.6% (10 करोड़) जितना एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है।

9 August: विश्व आदिवासी दिवस

क्यों मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस?

सबसे पहले 1977 में जेनेवा में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया।  जहां पर कोलंबस दिवस की जगह आदिवासी दिवस मनाये जाने की मांग की गई | इसके बाद लगातार संघर्ष बढ़ता गया और फिर आदिवासी समुदाय ने 1989 से आदिवासी दिवस मनाना शुरू कर दिया गया। आगे जनसमर्थन मिलता गया और फिर 12 अक्टूबर 1992 को अमरीकी देशों में कोलंबस दिवस के स्थान पर आदिवासी दिवस मनाने की प्रथा शुरू हो गई।

अमरीका में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पहली बार 1994 को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी वर्ष घोषित किया था। 1995-2004 को पहला अंतर्राष्ट्रीय दशक घोषित किया गया था। 2005-2015 को दूसरे अंतर्राष्ट्रीय दशक की घोषणा किया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 1994 के संकल्प 49/214 द्वारा प्रतिवर्ष 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाए जाने का ऐलान किया। इसके बाद पहली बार पूरे विश्व में 9 अगस्त 1995 को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाया गया।

World adivasi day

आदिवासियों का इतिहास और परंपरा

पुरातन संस्कृत ग्रंथों में आदिवासियों को ‘अत्विका’ नाम से संबोधित किया गया।  महात्मा गांधी ने आदिवासियों को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) से संबोधित किया। भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए "अनुसूचित जनजाति"' शब्द का उपयोग किया गया है।

भारत में आदिवासी समुदाय 

भारत में लगभग 700 आदिवासी समूह व उप-समूह हैं। इनमें लगभग 80 प्राचीन आदिवासी जातियां हैं। भारत की जनसंख्या का 8.6% (10 करोड़) जितना एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है।

देश के सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्र का 20 प्रतिशत भाग आदिवासी प्रदेश है जहां अनुमानतः राष्ट्रीय संसाधन का 70 प्रतिशत खनिज, वन, वन्य प्राणी, जल संसाधन तथा सस्ता मानव संसाधन विद्यमान है, फिर भी यहां के लोग विस्थापित हो रहे हैं जिसके कारण वे अपने मूल एवं समृद्ध देशज ज्ञान से दूर हो जा रहे हैं।

आदिवासियों की दुनिया और ज्ञान परंपरा

आदिवासियों के पास डिफेंस, डिजास्टर और डेवलपमेंट का अद्भुत ज्ञान है। ऐतिहासिक पुस्तकों एवं ग्रन्थों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि कैसे मुगल और अंग्रेज़ पूरे भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं लेकिन जब वे आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें मुह की खानी पड़ती है।

अंडमान के जरवा आदिवासी के द्वारा सुनामी जैसी भयानक प्राकृतिक आपदा में भी खुद को बचा लेने एवं इसका अंदेशा लगा लेने कि कोई भयानक प्रकृतिक आपदा आने वाली है ने इस विषय क्षेत्र के लोगों को यह विश्वास दिलाया कि आदिवासियों के पास डिजास्टर की अद्भुत समझ है। इसी प्रकार आदिवासी समाज में मदद की परंपरा है जिसे ‘हलमा’ कहते हैं। इसके अंतर्गत जब कोई व्यक्ति या परिवार अपने संपूर्ण प्रयासों के बाद भी खुद पर आए संकट से उबरने में असमर्थ होता है तब उसकी मदद के लिए सभी ग्रामीण जुटते हैं और अपने नि:स्वार्थ प्रयत्नों से उसे उस मुश्किल से बाहर निकालते हैं। यह परंपरा या ज्ञान चर्चा में तब आई जब 2018 में देश में भयानक जल संकट को देखते हुए आदिवासियों ने इस बार हलमा का आह्वान धरती मां के लिए किया।

इसका परिणाम यह रहा कि मात्र कुछ दिनों में देश के अन्य-अन्य स्थानों पर निशुल्क हजारों जल संरक्षण केंद्र तैयार कर दिए गए। 


समाज और जीवन जीने की पद्धतियां 

चिकित्सा -  लोक चिकित्सा ज्ञान भी आदिवासियों की महत्वपूर्ण ज्ञान परंपरागत् है जिसका सामुदायिक उपयोग होता है। इसे समाज के उन सदस्यों की स्वीकृति प्राप्त होती है जो अपने अनुभवों के आधार पर इसे स्थापित किए होते हैं। यह पूर्ण रूप से तार्किक मान्यताओं पर आधारित होती है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति इसे अव्यवस्थित चिकित्सा ज्ञान कहती है लेकिन लोक चिकित्सकीय ज्ञान का व्यक्ति के अंतरीकरण की प्रक्रिया से सम्बद्ध होता है एवं इसकी सबसे जरूरी शर्त इसका हस्तांतरित होते रहना होता है, यही इस ज्ञान की ताकत भी है।

प्यार मोहब्बत - दुनिया में आजकल वेलेनटिन डे मनाने का प्रचलन चाहे हो रहा है लेकिन असल में इसकी शुरुवात आदिवासी समुदाय ने हजारो वर्षो पहले ही कर दी थी। आदिवासी इलाकों में प्यार का उपहार स्वीकार करने वाली युवतियां प्रेमी को अपना जीवनसाथी बना लेती है।

आदिवासियों का राष्ट्र के प्रति समर्पण 

आदिवासियों ने अपने ज्ञान का उपयोग सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए किया। आजादी के आंदोलन में उनके योगदान को याद करना ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ को पूर्ण करेगा। आदिवासियों का राष्ट्र के प्रति वह अमृत भाव ही था जिसने सिद्दू और कान्हू, तिलका और मांझी, बिरसा मुंडा इत्यादि वीर योद्धाओं को जन्म दिया।

आज जब देश आजादी का अमृत महोत्सव माना रहा है।  आजादी के नायकों को याद कर रहा है। ऐसे में यह भी जरूरी है कि आदिवासियों के राष्ट्र प्रेम और इस प्रेम में दिए उनके अनोखे बलिदान को भी याद किया जाए। 1790 का ‘दामिन विद्रोह’, 1828 का ‘लरका आन्दोलन’, 1855 का संथाल का विद्रोह, यह सभी ऐसे आंदोलन रहे जिसमें भरी संख्या में आदिवासी ने अपना बलिदान दिया। आदिवासियों या वनवासियों की अपनी मिट्टी के प्रति प्रतिबद्धता ही राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता और सम्मान है।

आदिवासी राष्ट्र को सिर्फ स्वतंत्र ही नहीं बल्कि जागृत करने का काम भी अपने लोक संचार माध्यम के जरिये करते रहे हैं। बंगला लोक नाट्य ‘जात्रा’ का उपयोग स्वतन्त्रता संघर्ष में खूब किया गया।

लोकगान के परंपरागत रूप ‘पाला’ का उपयोग भी जनजागरूकता एवं स्वतन्त्रता आंदोलन में किया गया। इस प्रकार ऐसे कई उदाहरण इतिहास में मिलते हैं जहां लोक संचार माध्यम के जरिये आदिवासियों ने आजादी की अलख जगाए रखी।

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने कहा था - "यदि वाकई हमें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है तो देश में वैज्ञानिक शोध के अवसरों को न केवल आसान करने की जरूरत है, बल्कि भारत के अशिक्षित ग्रामवासी या सामान्य जन जो आविष्कार कर रहे हैं, उन्हें भी वैज्ञानिक मान्यता देकर उपयोग करने की जरूरत है।"

लगातार प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से पूरी दुनिया पर एक गहरा जलवायु संकट आ गया, वही आदिवासी समुदाय बचे हुए जल, जंगल, जमीन, पहाड़ों को बचाने में लगा हुआ है। कुछ देश अब भी जंगलो और प्रकृति संसाधनों का लगातार दोहन कर रहे है। जलवायु संकट से दुनिया को बचने के लिए अब प्रत्येक व्यक्ति को आदिवासी समुदाय के साथ कदम से कदम मिला कर चलना होगा।